प्रमोद वर्मा पन्ना/छतरपुर - मझगाय और रुंझ बांध, केन-बेतवा लिंक परियोजना तथा ललितपुर-सिंगरौली रेल मार्ग से प्रभावित आदिवासी किसानों के विस्थापन, मुआवजे और पुनर्वास की मांगों को लेकर चल रहा 'चिता आंदोलन' 10वें दिन बेहद आक्रामक मोड़ पर पहुंच गया है। सुबह से देर रात तक जारी इस सत्याग्रह में अब आंदोलनकारियों ने 'फांसी सत्याग्रह' और 'मिट्टी सत्याग्रह' भी शुरू कर दिया है।
आंदोलन स्थल पर जल-जंगल-जमीन, केन नदी और पन्ना टाइगर रिजर्व को बचाने की गूंज के बीच प्रभावितों का आक्रोश चरम पर है।
"प्रशासन लोकतंत्र का चीरहरण कर रहा है": अमित भटनागर
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा:
"जब गांवों में पानी भर रहा है और लोगों के आशियाने डूबने की कगार पर हैं, तब भी प्रशासन के पास विस्थापितों की पारदर्शी सूची और मुआवजे का कोई लेखा-जोखा नहीं है। महाभारत में जिस तरह दुशासन ने द्रौपदी का चीरहरण किया था, ठीक उसी तरह आज प्रशासन अपने ही कानूनों की धज्जियां उड़ाकर लोकतंत्र का चीरहरण कर रहा है। हमारा उद्देश्य विकास रोकना नहीं, बल्कि कानून के अनुसार न्यायपूर्ण पुनर्वास और पर्यावरण की रक्षा सुनिश्चित कराना है।"
पीड़ितों का दर्द: कागजों की हेराफेरी में फंसा मुआवजा
आंदोलन स्थल पर पहुंचे प्रभावितों ने अपने-अपने दस्तावेज दिखाते हुए प्रशासन की संवेदनहीनता उजागर की:
- 12.50 लाख के पैकेज का अधूरा सच: मझगाय और रुंझ बांध प्रभावितों ने बताया कि मुख्यमंत्री द्वारा घोषित ₹12.50 लाख के पैकेज में से 2 महीने बीत जाने के बाद भी पूरी राशि नहीं मिली है। दूसरी ओर, पुलिस बल के दम पर मकान तोड़ने की कार्रवाई तेज कर दी गई है।
- सिंचित जमीन को कागजों में बना दिया 'असंचित': ललितपुर-सिंगरौली रेलमार्ग से प्रभावित सबदुआ गांव के भूरा पटेल ने आरोप लगाया कि उनकी 2 बीघा सिंचित जमीन, जिस पर कुआं, ट्यूबवेल, पेड़ और मकान मौजूद हैं, उसे अधिकारियों ने रिश्वत के चक्कर में 'असंचित' दर्ज कर मात्र ₹1.15 लाख का मुआवजा तय किया है। सही समय पर आपत्ति दर्ज कराने का मौका भी नहीं दिया गया।
- डूब के बीच बेबस आदिवासी: मझगाय प्रभावित लंगड़ी आदिवासी का कहना है कि उनके बच्चों के नाम मुआवजा प्रक्रिया से हटा दिए गए और उन्हें केवल ₹5 लाख दिए गए। मकान डूबने की कगार पर है और मानसिक तनाव के कारण उनका परिवार बीमार पड़ा है।
बिजली-पानी काटा, नोटिस थमाए—पर पीछे हटने को तैयार नहीं ग्रामीण
आंदोलनकारियों ने आरोप लगाया कि उनकी समस्याओं को हल करने के बजाय प्रशासन आंदोलन स्थल की बिजली और पानी की आपूर्ति काट रहा है और शांति भंग के नोटिस जारी कर रहा है।
प्रशासनिक दबाव के बावजूद प्रभावित ग्रामीणों ने पीछे हटने से साफ इनकार कर दिया है। आंदोलन स्थल पर ही पक्की टपरियां (झोपड़ियां) तैयार कर ली गई हैं और राशन सामग्री एकत्रित कर लंबे संघर्ष की नींव रख दी गई है।
मांगें नहीं मानीं तो देशभर में खड़ा होगा राष्ट्रीय आंदोलन
'जय किसान संगठन' और प्रभावित ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ मुआवजे तक सीमित नहीं है, बल्कि केन-बेतवा परियोजना के कारण कटने वाले 46 लाख पेड़ों, पन्ना टाइगर रिजर्व के अस्तित्व और आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की लड़ाई है।
अमित भटनागर ने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने तत्काल पारदर्शी तरीके से पुनर्वास और मुआवजे का निस्तारण नहीं किया, तो देश के प्रमुख आदिवासी, किसान और सामाजिक संगठनों को जोड़कर इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर का आंदोलन बनाया जाएगा।
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