हाइलाइट्स:
- मूसलाधार बारिश और कड़ाके की ठंड के बीच 15 दिनों से सत्याग्रह पर बैठे हैं ग्रामीण।
- पुनर्वास और पूरे मुआवजे की मांग: 12.5 लाख की जगह हाथ में आए सिर्फ 5 लाख रुपये।
- प्रशासन पर अनदेखी का आरोप, न्याय, संविधान और इंसानियत की लड़ाई लड़ रहे प्रभावित।
प्रमोद वर्मा, छतरपुर/पन्ना, खबर केसरी:
आसमान से बरसती आफत, मौसम विभाग का रेड अलर्ट और चारों तरफ पानी में डूबते गांवों का खौफ... लेकिन इन सबके बीच भी 'चिता आंदोलन' के सत्याग्रहियों का हौसला नहीं टूटा है। भारी बारिश और कड़कड़ाती ठंड के बीच भी पिछले 15 दिनों से प्रभावितों का अहिंसक संघर्ष लगातार जारी है।
आधा-अधूरा मुआवजा, कैसे उजड़ते घरों को बसाएं?
ग्रामीणों का दर्द छलक रहा है। एक तरफ उनके घर डूब रहे हैं, पूरी जिंदगी उजड़ रही है, लेकिन दूसरी तरफ प्रशासन की कथित निष्ठुरता उनके जख्मों पर नमक छिड़क रही है। लोगों का कहना है कि उन्हें अब तक पूरा मुआवजा नहीं मिला है। कई प्रभावित ऐसे हैं जिन्हें तय किए गए 12.5 लाख रुपये में से सिर्फ 5 लाख थमा दिए गए हैं, तो वहीं कई ऐसे भी हैं जिन्हें ये 5 लाख भी नसीब नहीं हुए। ऐसे हालात में सबसे बड़ा सवाल यह है कि ये लोग अपने रहने की व्यवस्था आखिर कैसे और कहां करें?
बिना पुनर्वास डुबोने की कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल
आंदोलनकारियों ने बिना पूरे मुआवजे और उचित पुनर्वास के गांवों को डुबोने की कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। प्रकृति की दोहरी मार झेल रहे इन लोगों का सब्र अब भी कायम है।
यह सिर्फ घर की नहीं, इंसानियत की लड़ाई है
प्रदर्शनकारियों का साफ कहना है कि यह सिर्फ ईंट-पत्थर का घर बचाने की लड़ाई नहीं है। यह संविधान, न्याय और इंसानियत को बचाने का संघर्ष है। स्थानीय प्रशासन से लेकर भोपाल और दिल्ली तक बैठे हुक्मरानों से इन ग्रामीणों की यही गुहार है कि उनके साथ न्याय हो।
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