खबर केसरी, दुर्गाष्ठमी विशेष - नवरात्रि के पावन नौ दिनों में हर दिन देवी के अलग-अलग स्वरूपों की आराधना होती है, लेकिन जो बात 'दुर्गाष्टमी' या 'महाष्टमी' में है, वो सबसे अलग है। देश भर के पंडालों और मंदिरों में इस दिन भक्तों का सबसे बड़ा सैलाब उमड़ता है। 'खबर केसरी' के सभी पाठकों के लिए आज हम लेकर आए हैं महाष्टमी से जुड़ी वो खास मान्यताएं और महत्व, जो इस दिन को पूरे नवरात्रि का सबसे अहम पड़ाव बनाते हैं।
मां महागौरी की आराधना और पापों का नाश
नवरात्रि के आठवें दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप 'मां महागौरी' की पूजा होती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव को पाने के लिए माता ने सालों तक कठोर तपस्या की थी, जिससे उनका शरीर काला पड़ गया था। जब भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें गंगाजल से स्नान कराया, तो उनका शरीर मोतियों की तरह चमकने लगा और तभी से उन्हें 'महागौरी' कहा जाने लगा। मान्यता है कि इनकी सच्चे मन से पूजा करने से इंसान के सारे पूर्व जन्म के पाप धुल जाते हैं और जीवन में शांति आती है।
कन्या पूजन के बिना अधूरा है व्रत
अष्टमी के दिन की सबसे खूबसूरत और जरूरी परंपरा है 'कन्या पूजन'। इस दिन 2 से 10 साल तक की बच्चियों को घर बुलाकर उनके पैर धोए जाते हैं और उन्हें हलवा, चना और पूरी का प्रसाद खिलाया जाता है। हिंदू मान्यताओं में इन छोटी कन्याओं को साक्षात मां दुर्गा का रूप माना गया है। कहते हैं कि जब ये कन्याएं खुश होकर घर से जाती हैं, तो अपने साथ घर में सुख, शांति, समृद्धि और तरक्की का आशीर्वाद छोड़ जाती हैं।
'संधि पूजा' का रहस्य और शक्ति
दुर्गाष्टमी की सबसे खास और तांत्रिक रूप से अहम बात 'संधि पूजा' है। यह वो समय होता है जब अष्टमी तिथि खत्म हो रही होती है और नवमी तिथि लग रही होती है। शास्त्रों के अनुसार, ठीक इसी जंक्शन (संधि काल) पर मां दुर्गा ने चंड और मुंड नाम के खूंखार राक्षसों का सर्वनाश किया था। इस वक्त 108 दीये जलाकर मां की आराधना करने से कैसी भी बड़ी परेशानी या बुरी शक्ति हो, उसका अंत हो जाता है।
अस्त्र-शस्त्र पूजन और शक्ति का सम्मान
महाष्टमी के दिन कई जगहों पर, खासकर बड़े पूजा पंडालों और घरों में, मां के साथ-साथ अस्त्र-शस्त्रों (हथियारों और औजारों) की भी पूजा की जाती है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत और मातृशक्ति के प्रति सम्मान जताने का एक प्राचीन तरीका है।
व्रत का मिलता है पूरा फल
बहुत से श्रद्धालु ऐसे होते हैं जो भागदौड़ भरी जिंदगी या स्वास्थ्य के चलते पूरे नौ दिन का व्रत नहीं रख पाते। धार्मिक मान्यताओं में कहा गया है कि अगर कोई भक्त सिर्फ पहला (प्रतिपदा) और आठवां (अष्टमी) व्रत भी पूरी श्रद्धा से रख ले, तो माता रानी उसे पूरे नौ दिनों के व्रत के बराबर ही फल देती हैं।
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